मुग्ध नहीं होता मन अब, प्रिय तुम्हारी बातों पर ।
मुग्ध नहीं होता मन अब, प्रिय तुम्हारी बातों पर । संयम मन ने साध लिया है, चंचल से जज्बातों पर । मुग्ध नहीं होता मन अब, प…
मुग्ध नहीं होता मन अब, प्रिय तुम्हारी बातों पर । संयम मन ने साध लिया है, चंचल से जज्बातों पर । मुग्ध नहीं होता मन अब, प्रिय तुम्हारी बातों पर । माना तुमसे घृणा नहीं है, इस पल की बस कृपा यही है, और तुम्हारी बातों का भी, मुझको कोई गिला नहीं है, बस पुलकित हृदय न…
Svaghoshit Lekhika
प्रिये संग्रहिका , ऐसे दिन भी आ गए हैं कि घंटो आँखें बंद करके लेटे रहने के बावजूद नींद नहीं आती। कहाँ लेटते ही निद्रा की गोद में समा जाया करती थी। कोई बेचैनी नहीं बस दिन में थोड़ा सो लिया था इसीलिए नींद नही आ रही है। कुछ टार्गेट्स अधूरे छूट गए आज भी, उसका भी थ…
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मुझे अपने भीतर, कुछ खालीपन सा नहीं लगता , बस उसी प्राचीनता का आभास होता है जो पहले हुआ करता था । फर्क़ बस अब इतना है ; कि वो 'प्राचीनता' जो मुझे पहले सामान्य लगती थी अब नीरस लगने लगी है! तुमसे मिलकर, जिस नवीनता का उद्गार हुआ था उसने मेरे व्यक्त…
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एक खत तुम्हारे नाम तुम्हें देखकर अब अच्छा नहीं लगता! तुम्हें देखने से अब शीतल हवाएँ नहीं चलतीं, तुम्हें देखने से पेट में तितलियाँ महसूस नहीं होतीं, तुम्हें देखने से आँखों में नूर नहीं आता, तुम्हें देखने से तन में बिजली नहीं कौंधती । और सबसे ज़रूरी, तुम…
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प्रिये संग्रहिका , बड़े दिनों बाद आयी ना ? बहुत ख़ुशी हो रही है। आ तो गयी हूँ पता नहीं जो बात शुरू करने जा रही हूँ वो ख़त्म कर भी पाऊँ या नहीं !! वैसे भी आजकल जो भी शुरू करती हूँ उसे ख़त्म नहीं कर पाती। बीच में ही छोड़ देती हूँ। कुछ चीजों का बीच में छोड़ दिया जा…
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कैसी हो सखी ? सबसे पहले तो कान पकड़ कर माफ़ी चाहूँगी ! हाँ , पता है महीनों बीत गए आये। पर क्या करूँ ? अब समय की बड़ी किल्लत है ! हाँ , बहुत व्यस्त रहने लगी हूँ। तुमसे बात करने के लिए केवल समय नहीं इत्मीनान भी साथ लाना पड़ता है और मैं समय ले भी आऊँ तो अब इत्मीनान …
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प्रिय संग्रिहका, बस अभी-अभी घर के लिए निकली हूँ प्रयाग से । पता नही तुमको बताया था या नही, पर हाँ अब आगे की जीवन यात्रा यहीं से होकर गुजरेगी । पिछली बार जब आयी थी तो तुमसे क्या-क्या बातें की थीं ये भी ध्यान नहीं, पिछली बार तो शायद पिछले महीने ही आयी थी। वैस…
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प्रिये संग्रहिका , बहुत दिनों से आने का सोच रही हूँ ,पर वही है किसी न किसी कारण से तुमसे मिलना टल जा रहा था। ४ तारीख को ही आ गयी थी यहाँ , यहाँ यानि प्रयाग। उसके बाद तो बहुत कोशिश की आने की पर व्यस्तता इतनी अधिक थी कि तुमसे मिलना टालती रही। तुम्हारे इंतज़ार की…
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प्रिये संग्रहिका , आज पूरे १ माह हो चुके हैं। गला आज भी उतना ही रुँधा है। आँखे आज भी उतनी ही नम हैं। जीवन में पहली दफा किसी इतने करीबी को खोया है। बच्चे रहो तो चीजे उतनी समझ नहीं आती हैं। लेकिन थोड़ा बड़े हो जाने के बाद अपने साथ साथ उन सभी का दुःख समझ आने लगता…
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प्रिये संग्रहिका , अस्वीकारता बहुत मुश्किल होता है कुछ चीज़ों को स्वीकार पाना। दिल और दिमाग दोनों ये मानने को तैयार ही नहीं हैं कि अम्मा नहीं हैं। बीते 15-20 कैसे गुज़रें हैं ये मुझे खुद को नहीं पता। घर में जिसको देखो उसी की आँखें नम रहती थीं। इसीलिए किसी की …
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" बच्ची अब बचबै ना ! " ( यही आखिरी बात हुई थी अम्मा से दो दिन पहले। ) " अम्मा यस काहे कहत हू !! " ( और मैं इस वाक्य के आगे कुछ बोल ही नहीं पायी , गला रुंध गया था। ) १ महीने पहले यहीं थीं अम्मा। लेकिन परीक्षाओं के चलते ज्यादा बात चीत न…
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प्रिये संग्रहिका, गुस्से की भेंट चढ़ी बहने ! तुम्हारी दो बड़ी बहनों को गुस्से की भेंट चढ़ा चुकी हूँ। तुम्हारे तक भी उस गुस्से की लपटें पहुँचने ही वाली थीं लेकिन शुक्र मनाओ तुम्हारी बड़ी बहनों ने तुमको बचा लिया। उनकी भेंट ने ही मेरे हृदय में इतना अधिक कंपन पैदा कि…
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कैसी हो सखी ? अपना बताऊँ तो, मैं तो ठीक हूँ पर इस बीच आसपास बड़ी ही विचित्र घटनाएँ घटित हो रही हैं - देश में भी और परिवार में भी !! कुछ दिन पहले तुमसे हुयी बातचीत बड़ी ही प्रासंगिक थी और इस बीच उसी के कई जीवंत उदाहरण भी देखने को मिले। कल यानि 12 को इस वर्ष का …
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प्रिय संग्रहिका , जानती हूँ ये कोई उचित समय नहीं है आने का, लेकिन फिर भी आदत से मजबूर एक बार वापस तुम्हारे पास मुँह उठा कर चली आयी हूँ। अब आ ही गयी हूँ तो मंतव्य भी बता ही देती हूँ बिना इधर-उधर की बात किये। तो बात कुछ ऐसी है कि , बीते कुछ सालों में, न्यूज़ में…
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प्रिय संग्रहिका , बड़ी तीव्र इच्छा है पुनः आरम्भ करने की। कुछ गलतियाँ, कुछ भूल पूर्वरत/undo नहीं किये जा सकते हैं। कुछ पन्नो के दूषित होने पर, कई बार, पन्ने नहीं फाड़े जाते, बल्कि पूरी की पूरी किताब ही फेंक देनी पड़ती है !! मेरे पास भी एक किताब है, जिस…
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प्रिय संग्रहिका , तुम्हारा उत्तर मिला, मेरे पिछले ब्लॉग में पूछे गए प्रश्न का। मैंने पूछा था... " कैसी हो ? " तुम्हारा जवाब आया - " तुमसे अच्छी हूँ। " इससे अधिक तुमने कुछ लिखा ही नहीं। अब इन तीन शब्दों से मैं क्या अर्थ निकालूँ ? मेरे …
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प्रिये संग्रहिका , कैसी हो ? ( उत्तर की अपेक्षा है ! ) मेरी चिंता मत करना , मैं ठीक हूँ। बस कभी-कभी ओवर थिंकिंग अधिक हावी हो जाती है। पर फिर संभाल लेती हूँ। पिछले २ हफ़्तों से बहुत कुछ हुआ है जिसका ब्यौरा तुम्हें देना बाकी है। अच्छा , कभी तुम्हारे साथ ऐसा…
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प्रिय संग्रहिका , कैसी हो ? आज फिर से रोने आयी हूँ। अगर सुनने का मन नहीं होगा तो मत सुनना लेकिन यहीं बैठी रहना। पिछले दो दिन से मैंने क्या किया है उसका कोई भी रिकॉर्ड नहीं है मेरे पास लेकिन इतना पता है की कुछ भी प्रोडक्टिव काम नहीं किया है। बड़ा बेकार लग रह…
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प्रिये संग्रहिका , तुम मुझसे पूछती क्यों नहीं कि " मैं तुम्हारे लिए इतनी ही प्रिये हूँ तो मुझसे रोज़ मिलने क्यों नहीं आती ? " मुझे पता है तुम नहीं पूछोगी , तुम समझदार हो या फिर शायद भोली हो कि तुम्हे मेरा स्वार्थ नज़र नहीं आता। इस समय मन में केवल एक…
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मुग्ध नहीं होता मन अब, प्रिय तुम्हारी बातों पर । संयम मन ने साध लिया है, चंचल से जज्बातों पर । मुग्ध नहीं होता मन अब, प…