वो हिस्सा जो सिर्फ़ तुम्हारे हिस्से आया !
मुझे अपने भीतर, कुछ खालीपन सा नहीं लगता , बस उसी प्राचीनता का आभास होता है जो पहले हुआ करता था । फर्क़ बस अब इतना है…
मुझे अपने भीतर, कुछ खालीपन सा नहीं लगता , बस उसी प्राचीनता का आभास होता है जो पहले हुआ करता था । फर्क़ बस अब इतना है ; कि वो 'प्राचीनता' जो मुझे पहले सामान्य लगती थी अब नीरस लगने लगी है! तुमसे मिलकर, जिस नवीनता का उद्गार हुआ था उसने मेरे व्यक्त…
Svaghoshit Lekhika
एक खत तुम्हारे नाम तुम्हें देखकर अब अच्छा नहीं लगता! तुम्हें देखने से अब शीतल हवाएँ नहीं चलतीं, तुम्हें देखने से पेट में तितलियाँ महसूस नहीं होतीं, तुम्हें देखने से आँखों में नूर नहीं आता, तुम्हें देखने से तन में बिजली नहीं कौंधती । और सबसे ज़रूरी, तुम…
Svaghoshit Lekhika
प्रिये संग्रहिका , बड़े दिनों बाद आयी ना ? बहुत ख़ुशी हो रही है। आ तो गयी हूँ पता नहीं जो बात शुरू करने जा रही हूँ वो ख़त्म कर भी पाऊँ या नहीं !! वैसे भी आजकल जो भी शुरू करती हूँ उसे ख़त्म नहीं कर पाती। बीच में ही छोड़ देती हूँ। कुछ चीजों का बीच में छोड़ दिया जा…
Svaghoshit Lekhika
कैसी हो सखी ? सबसे पहले तो कान पकड़ कर माफ़ी चाहूँगी ! हाँ , पता है महीनों बीत गए आये। पर क्या करूँ ? अब समय की बड़ी किल्लत है ! हाँ , बहुत व्यस्त रहने लगी हूँ। तुमसे बात करने के लिए केवल समय नहीं इत्मीनान भी साथ लाना पड़ता है और मैं समय ले भी आऊँ तो अब इत्मीनान …
Svaghoshit Lekhika
प्रिय संग्रिहका, बस अभी-अभी घर के लिए निकली हूँ प्रयाग से । पता नही तुमको बताया था या नही, पर हाँ अब आगे की जीवन यात्रा यहीं से होकर गुजरेगी । पिछली बार जब आयी थी तो तुमसे क्या-क्या बातें की थीं ये भी ध्यान नहीं, पिछली बार तो शायद पिछले महीने ही आयी थी। वैस…
Svaghoshit Lekhika
प्रिये संग्रहिका , बहुत दिनों से आने का सोच रही हूँ ,पर वही है किसी न किसी कारण से तुमसे मिलना टल जा रहा था। ४ तारीख को ही आ गयी थी यहाँ , यहाँ यानि प्रयाग। उसके बाद तो बहुत कोशिश की आने की पर व्यस्तता इतनी अधिक थी कि तुमसे मिलना टालती रही। तुम्हारे इंतज़ार की…
Svaghoshit Lekhika
प्रिये संग्रहिका , आज पूरे १ माह हो चुके हैं। गला आज भी उतना ही रुँधा है। आँखे आज भी उतनी ही नम हैं। जीवन में पहली दफा किसी इतने करीबी को खोया है। बच्चे रहो तो चीजे उतनी समझ नहीं आती हैं। लेकिन थोड़ा बड़े हो जाने के बाद अपने साथ साथ उन सभी का दुःख समझ आने लगता…
Svaghoshit Lekhika
मुझे अपने भीतर, कुछ खालीपन सा नहीं लगता , बस उसी प्राचीनता का आभास होता है जो पहले हुआ करता था । फर्क़ बस अब इतना है…