एक खत तुम्हारे नाम
तुम्हें देखकर अब अच्छा नहीं लगता!
तुम्हें देखने से अब शीतल हवाएँ नहीं चलतीं,
तुम्हें देखने से पेट में तितलियाँ महसूस नहीं होतीं,
तुम्हें देखने से आँखों में नूर नहीं आता,
तुम्हें देखने से तन में बिजली नहीं कौंधती ।
और सबसे ज़रूरी,
तुम्हें देखकर अब आराम नहीं आता,
ना ही तुम्हें देखकर मेरी थकान मिटती है।
मुझे अचरज है,
मेरा मन इतनी जल्दी कैसे हट गया तुमसे !
लेकिन फिर,
थोड़ा पीछे जाती हूँ,
तो तसवीर बिल्कुल साफ हो जाती है।
मैं तो कभी तैयार ही नही थी !!
मैंने शुरुआती दिनों में ही न जाने कितनी बार ,
अपने कदम वापस खींचे थे ।
लेकिन तब तुम्हारे मोहपाश ने
मुझे जकड़ लिया था ।
उससे भी अधिक ये कि
मेरे कारण किसी का दिल न दुखे।
और तुमसे तो उस वक्त
विशेष लगाव था ही ।
लेकिन,
सिर्फ लगाव था !
और मैं भूल गई थी कि 'लगाव'
कितना भी अधिक गहरा हो जाए
वो 'प्रेम' नहीं हो सकता ।
उसके बाद भी मैंने कई बार
अपने कदम वापस खींचने की कोशिश की।
और तुम हर बार मुझे बाँधने का प्रयास करते रहे,
पर वो बंधन लगाव का था।
बंधन कैसा भी हो ,
यदि वो प्रेम का नहीं ,
तो मुझे अप्रिय है !
और यही अप्रियता
मुझे अब घुटन का अहसास कराती है।
मुझे हर क्षण चिंता रहती है,
कहीं हम इतना दूर ना निकल जाएँ....
कि लौटना मुश्किल हो।
"जीवन नर्क हो जाएगा !"
दिन प्रतिदिन शरीर घुलता जाता है!
समझ नहीं आता...
बीमारी में शरीर का ताप अधिक है
या मन में चिंता का!
दोनों ही दीमक की भाँति
मुझे खाते जाते हैं !
उसपर तुमसे मन की व्यथा कहो
तो तुम्हारे जवाब से मन तिलमिला उठता है!
"तुम सोचती बहुत हो !!"
