मुझे अपने भीतर,
कुछ खालीपन सा नहीं लगता ,
बस उसी प्राचीनता का आभास होता है
जो पहले हुआ करता था ।
फर्क़ बस अब इतना है ;
कि वो 'प्राचीनता'
जो मुझे पहले सामान्य लगती थी
अब नीरस लगने लगी है!
तुमसे मिलकर,
जिस नवीनता का उद्गार हुआ था
उसने मेरे व्यक्तित्त्व में एक नया हिस्सा जोड़ दिया था।
पर अफ़सोस !
वो हिस्सा जो सिर्फ़ तुम्हारे हिस्से आया..
अब मर चुका है,
और मेरे भीतर जन्म दे गया है
एक खालीपन को ।
जिस हिस्से की तलाश करते
तुम मेरी दहलीज पर आते हो,
अब वहाँ तुम्हारा स्वागत करने के लिए
सिर्फ खालीपन है!
संवेदना या प्रेम नहीं !
( मुझे खेद है )
