मुग्ध नहीं होता मन अब, प्रिय तुम्हारी बातों पर ।
संयम मन ने साध लिया है, चंचल से जज्बातों पर ।
मुग्ध नहीं होता मन अब, प्रिय तुम्हारी बातों पर ।
माना तुमसे घृणा नहीं है,
इस पल की बस कृपा यही है,
और तुम्हारी बातों का भी,
मुझको कोई गिला नहीं है,
बस पुलकित हृदय नहीं होता अब, प्रेम, पुष्प, सौगातों पर ।
मुग्ध नहीं होता मन अब, प्रिय तुम्हारी बातों पर ।
तुममें कोई कमी नहीं है,
पर जो चाहा वो मिला नहीं है,
मन में रोष हो बातों का,
ऐसी कोई बात नहीं है,
बस शेष नहीं अनुराग कोई अब, केवल क्षोभ हालातों पर ।
मुग्ध नहीं होता मन अब, प्रिय तुम्हारी बातों पर ।
कोई खास वजह नहीं है,
बस पहली सी अब बात नही है,
एकांत ढ़ूंढ़ता फिरता है मन,
प्रेम से कोई वैराग नही है,
बस नही ठहरती दृष्टि मेरी अब, सावन की बरसातों पर ।
मुग्ध नहीं होता मन अब, प्रिय तुम्हारी बातों पर ।
~ रूप
