प्रिये संग्रहिका ,
बड़े दिनों बाद आयी ना ? बहुत ख़ुशी हो रही है। आ तो गयी हूँ पता नहीं जो बात शुरू करने जा रही हूँ वो ख़त्म कर भी पाऊँ या नहीं !! वैसे भी आजकल जो भी शुरू करती हूँ उसे ख़त्म नहीं कर पाती। बीच में ही छोड़ देती हूँ। कुछ चीजों का बीच में छोड़ दिया जाना भी बेहतर होता है , समय की मांग वही होती है। जैसे अगले वर्ष में जाने से पहले किसी का हाथ छोड़ देने का संकल्प लेकर आगे बढ़ रही हूँ। इस बार नए वर्ष में आसपास कोई भी नहीं होगा। ऐसा ही नववर्ष तो मैं हमेशा से मनाना चाहती थी। मैं तुम और मेरी ये कलम। वैसे यहाँ तो कलम नहीं। आज ये अकेलापन रास नहीं आ रहा है।
एक और संकल्प लेना चाहती हूँ अगले वर्ष के लिए। पर मुझे पूरा भरोसा है कि मैं वो पूरा नहीं कर पाऊँगी। तुमसे रोज़ ही मिलना संभव है क्या भला !? रात में अक्सर बहुत थक जाती हूँ। भरी जवानी में बुढ़ापे का सुरूर चढ़ा हुआ है शरीर को और उससे भी अधिक मन को। यहाँ सारी बाते नहीं कर सकती तुमसे। कुछ बातों को बिना परदे के साथ ही कहना चाहती हूँ तुमसे पर यहाँ पर्दा जरूरी है। परदे से याद आया वो मुखौटे वाले श्रीमान अरे हाँ वही अपने कलम मित्र। अभी अभी उनका एक ब्लॉग पढ़कर आ रही हूँ। उनकी निरंतरता से तो बड़ी प्रभावित हूँ मैं। पिछले वर्ष लिखना शुरू किया था उन्होंने रेगुलर बेसिस पर इसी महीने। तबसे अबतक निरंतरता बनी हुई है। शुरू में तो मैं भी उनके साथ ही निरंतर रही , वो लिखते जाते मैं पढ़ती जाती। पर यहाँ आने के बाद तो समय का पहिया ऐसा घूमा कि समय अब मेरे हाथ ही नहीं आता। बीच में निरंतरता टूट भी गयी पर मैं समय निकल कर पढ़ती जाती थी। कई-कई बार तो एक-एक दिन में 6 -7 ब्लोग्स भी पढ़े मैंने। सच बताऊं तो बीच में रसप्रद भी कम लगने लगे थे मुझे उनके ब्लोग्स। सबमें एक ही बात होती थी। हालांकि उनका पूरा प्रयास रहता था कि लेखन में एकरूपता न आये। पर जब जीवन एक जैसा ही जा रहा हो तो इंसान करे भी क्या ! ख़ैर लिखने की शैली तो बढ़िया है उनकी।।।।।।।।।बड़ा लम्बा ब्रेक हो गया २ घंटे बाद वापस लौटी हूँ लिखने, अब इच्छा नहीं हो रही.......
विदा दो !
