प्रिये संग्रहिका ,
रात के करेक्ट एक बज रहे हैं। आज इतने दिनों बाद अचानक आने का कारण बेशक तुम नहीं पूछोगी। क्योंकि तुम शायद वाकिफ़ हो मेरी इन हरकतों से और अब तो पूरी तरह अपना भी लिया होगा मेरी इन कमियों के साथ मुझे। अब बहुत कुछ हजम कर जाता है मेरा मन। पेट से अधिक पाचक रसायन मेरे मन में बनते हैं अब। इसीलिए तो लगभग सारी ही बातें पचा ले जाता है ये मन। लेकिन फिर भी कुछ बातें उगल देनी चाहिए क्यूंकि कुछ रसायन इतने कंसन्ट्रेटेड नहीं होते जितनी कंसन्ट्रेटेड होतीं हैं कुछ घटनाएं। और ये बातें मन में अटक कर वह बदहज़मी पैदा कर देती हैं।
ख़ैर आज लगभग बातें रूपकों में ही होंगी। पर्दे जरूरी हैं ना।
बीते दिनों या कह लो महीनो में बहुत कुछ हुआ है। तुमको लिखे ना जाने कितने खत अधूरे छूट गए हैं। जो कभी पूरे ही नहीं हो पाए। सोचो वो काम जो मंजिल तय किये बिना ही अपना सफर तय करते हैं कितने अभागे होते हैं ,उन्हें पता ही नहीं होता कि उनका सफर कभी पूरा ही नहीं होने वाला है। ऐसा ही एक सफर मैंने भी शुरू किया था जिसकी मजिल तय नहीं थी लेकिन अंजाम मुझे बखूबी पता था। जिसके साथ चलना था उसका दृष्टिकोण कुछ और हो सकता है इस सफर को लेकर। मैं अपना दृष्टिकोण फिर भी एक बार स्वयं को स्पष्ट करने के लिए ही सही लिपिबद्ध कर लेना चाहती हूँ।
मैं शुरू से ही निश्चित नहीं थी इस सफर को लेकर। और मैं कभी शुरू भी नहीं करना चाहती थी , क्योंकि जिस रास्ते हम जाने कि सोच रहे थे उस रास्ते पर जाना मुझे अपराध लगता था। (जो कि शायद था नहीं) फिर भी मैंने बस भरोसा करके उसका हाथ पकड़ चलना शुरू कर दिया। बीच में बहुत सारे उतार चढ़ाव थे। गज़ब बात तो ये कि उतार हमेशा मेरे कारण आता था और मेरा हाथ पकड़ हमेशा चढ़ाव की और वो ले जाया करता था। कई बार तो मैं ख़ुशी ख़ुशी हाथ पकड़ चल देती थी। कई बार मुझे नहीं इच्छा होती थी आगे बढ़ने की। मैं सब कुछ छोड़ वापस लौट जाना चाहती थी। सब कुछ , वो रास्ता , उसमे आये पेड़ों की छाँव , सुन्दर कलियाँ ,खिलखिलाते फूल , उसका हाथ , और उसको भी। क्योंकि मैं डरती थी , उस रस्ते से , पतझड़ से , कांटो से , उसके साथ हाथ पकड़कर चलने से और..... उससे भी !!!
मुझे नहीं पता उसको उस रास्ते से जाकर कौन सी मजिल मिलने वाली थी , पर मैं जब जब सुनती थी उस मंजिल की कल्पनाओं को तो डर जाती थी, जहां वो सिर्फ मेरे साथ जाना चाहता था।
पर मैं तो ऐसे रास्तों पर चलने के लिए बनी ही नहीं हूँ ना। मेरी मजिल तो कुछ और है। मेरे रास्ते कुछ और हैं। मेरी मंजिल तक पहुँचाने वाले पतझड़ भी मुझे प्रिये होंगे , उनके काँटों को तो सीने से लगाउंगी। क्योंकि ये वही क्षड़िकाएँ हैं जो मुझे आने वाली मंजिल के तैयार करते !
मैं जब भी उस रास्ते को छोड़ जाने की बाते करती वो मेरा हाथ और कसकर पकड़ लेता और उतनी ही तेजी के साथ आगे भी बढ़ने लगता। मुझे अपनी इच्छा के विरुद्ध जाने में समस्या नहीं है। समस्या तब है जब मुझे अपने सिद्धांतों के विरुद्ध जाना पड़े।
उम्र, समय, जगह और परिस्थिति के अनुसार ही किसी के भी सिद्धांत बनते बिगड़ते हैं। इन सिद्धांतों के बनने में जितना समय लगता है उसके ठीक विपरीत इसके बिगड़ने में पलक झपकने भर का अंतर होता है। और बिगड़ने पर जो अपराधबोध मन में उतरता तो वो अंदर ही अंदर मन को खा जाता है। मुझे अपने सिद्धांतों पर गर्व हुआ करता था ,क्युंकी मेरे सिद्धांत मुझे साधू होने का आभास कराते थे। और साधू होना हमारी संस्कृति का सबसे उच्चतम स्थान है। मुझे नहीं पता मुझे उच्चतम स्थान तक क्यों पहुंचना था , पर मैं इतना जरूर जानती थी कि वहाँ पहुँचने से मेरी आत्मा को अलग ही तृप्ति मिलती। अब तो बहुत कुछ साफ़ साफ़ नज़र आता है। सब कुछ तो छलावा ही है , मेरी संस्कृति, मेरे सिद्धांत , मेरा साधुवाद ,उच्चतम स्थान सब कुछ लेकिन जो छलावा नहीं था वो था, उस उच्चतम स्थान तक पहुँचने की मेरी लालसा।
पर अपने ही हाथों अपने सिद्धांतों का गला घोंटने का जो अपराध मुझसे हुआ है उसकी सज़ा अब हर दिन मिल रही है मुझे। हर जगह पर तो हारती हुई नज़र आती हूँ अब। वो सिद्धांत ही तो मेरी रीढ़ की हड्डी हुआ करते थे !
जिसे मैंने जाने अनजाने खुद ही भारी चोट पहुंचाई है। आत्मविश्वास तो ऐसा डगमगा गया है कि आईने के सामने खुद को देखने में भी शर्म आ जाती है। स्वयं के प्रति इतनी घृणा भर गयी है भीतर कि वहाँ किसी और भावना का कोई स्थान ही नहीं बचा है अब। ना तो आत्मविश्वास , ना ही गर्व , ना ही सहानुभूति और ना ही प्रेम। और उसे तो मुझसे प्रेम की ही अपेक्षा है। अब कैसे बताऊँ कि मन में अब सिवाय घृणा के कुछ भी नहीं है , और इसकी जिम्मेदारी का कुछ हिस्सा उसके भी सिर जाता है।
उसे मुझसे ढेरों अपेक्षाएं हैं जो भविष्य तक जाती हैं। अपेक्षाएं तो ख़ैर मुझे भी थीं लेकिन भविष्य नहीं वर्तमान को लेकर। बस इतना ही कि मुझे और मेरे सिद्धांतों को समझा जाये। मेरे सिद्धांतों ने कुछ मर्यादाएँ भी तय कर रखीं थीं मेरे लिए। और मर्यादाओं की सीमा लाँघने का अधिकार किसी को नहीं होना चाहिए उसे भी नहीं। पर उसने क्या किया ! हर बार मेरी मर्यादाएँ लाँघी , यहाँ अपराधी सिर्फ वो नहीं मैं भी थी क्यूंकि साथ तो मैंने भी दिया अपनी ही मर्यादाओं की सीमा भंग करने में। मैंने कोशिश की थी बचने की पर शायद जितनी करनी चाहिए थी उतनी नहीं की। उसका अपराध क्षमा योग्य है , मेरा नहीं। उसे तो ख़ैर लगता भी नहीं कि ये कोई अपराध था। ये दुःख और भी भारी है। और जो अपराध ही नहीं उसकी सज़ा कैसी। हाँ ठीक है नहीं होगा ये अपराध उसकी नज़र में , पर मेरी नज़र में है। और अपराध किया है तो दंड की भी बराबर अधिकारी हूँ। पर स्वयं के लिए कोई दंड सुनिश्चित कर नहीं पायी हूँ अभी तक। फ़िलहाल के लिए खुद को उससे ,और उसके रास्ते से पृथक कर लेना ही न्यूनतम दंड जान पड़ रहा है मुझे। जो कर भी लिया है।
मुझे खुद को उससे अलग कर लेना कष्टकारी इसलिए नहीं जान पड़ रहा क्यूँकि मुझे संतुष्टि है कि कमसे कम इतने बड़े अपराध के लिया एक छोटा ही सही पर दंड सुनिश्चित तो हुआ। समस्या उसके लिए है। कष्टकारी उसके लिए है। क्यूँकि उसे तो ये अपराध लगता ही नहीं। और बिना अपराध के दंड ! कष्टकारी तो होता है।
मैं समझती हूँ इस समय उसकी मनोदशा क्या होगी , मैं बुरी इंसान हूँ। मैं बस इस समय उस परिस्थिति में नहीं हूँ कि उसे समझा सकूँ। मैं अभी अपने दंड की पीड़ा को जितना अधिक हो सके उतना अधिक बनाने में प्रयासरत हूँ , जबतक अपराध का बराबर दंड नहीं मिल जाता तबतक असंतुष्टि घर किये रहेगी मन में। मैं हर उस छोटी से छोटी पीड़ा को महसूस करना चाहती हूँ जो एक साथ आ जाएँ तो इंसान की जान तक लिए जाएँ। पर नहीं इतनी जल्दी जान नहीं गँवानी है, अभी तो भोगना है !!
चलो आती रहूंगी पीड़ा की हर स्टेज का अपडेट देने। फ़िलहाल के लिए विदा दो। ख्याल रखना अपना। और मेरी तरह अपने सिद्धांतों की आहुति मत दे देना क्षड़िक सुख के लिए। शुभरात्रि।

