प्रिये संग्रहिका ,
देखो माफ़ी तो मैं माँगूंगी क्योंकि मैंने तोड़ा है अपना वादा , हर हफ्ते तुमसे मिलने आने का। बेशर्म हो गयी हूँ ना !? क्या करूँ परिस्थतियाँ ही कुछ ऐसी हो गयी थीं। हाँ मैं फिर से बहानों का रोना रो रही हूँ। पर सच है ये बात। बीते दिनों तबियत भी बहुत भयंकर बिगड़ गयी थी। और हाल ऐसा है कि अभी तक ठीक ना हुई है। दवाई पर ही जीवन बसर हो रहा है। कल रात दवा खाना भूल गयी थी, तो उसका भुगतान मुझे अभी करना पड़ रहा है। लगता है आज भी लाइब्रेरी नहीं जा पाऊँगी। एक टाइम का दवा छूट जाये तो मजाल है ये बुखार नामक बेताल मेरे ऊपर सवार होना भूल जाये। खरास भी हो रखी है। जुखाम का तो पूछो ही मत। और सबसे ज्यादा पीड़ा ये सिर दर्द से हो रही। अभी भी बुखार चढ़ा हुआ है माथे पर ,पढ़ने की तनिक इच्छा नहीं हो रही है। इंस्टाग्राम भी बंद कर दिया है , तो सोचा तुमसे ही बात किया जाये। वैसे कल पिता जी से एक विषय पर चर्चा हो रही थी। विषय था " जनरेशन गैप " यानि पीढ़ियों के मध्य अंतर।
जनरेशन गैप केवल उम्र में अंतर के कारण नहीं होता है। ये मुख्यतः विचारों में अंतर के कारण उत्पन्न होता है। जनरेशन गैप से पहले एक चीज और समझना बहुत आवश्यक है। वो ये कि हर पीढ़ी में दो तरह की धाराएँ उत्पन्न होती हैं। पहली वो, जिनके मूल्य पिछली पीढ़ी के थोड़े बहुत मूल्यों को संजोये रहती है। और दूसरी वो, जो पिछली पीढ़ी के मूल्यों की परछाईं भी नहीं पड़ने देती अपने मूल्यों पर। अगर आम या सहज भाषा में कहें तो पिछली जनरेशन के अनुसार; पहली, बिगड़ी हुई के अंतर्गत आती है जिसे सुधारा जाना संभव है और दूसरी वो जो हाथ से पूरी तरह निकल गयी है जिसे अब खुल्ला छोड़ देना चाहिए। कठिन लग रहा हो तो उदहारण देके समझाऊँ क्या ? चलो वही उदहारण लेती हूँ जो आजकल बड़ी ही चिंता का विषय बना हुआ है हमसे एक पीढ़ी पहले वालों के लिए। रिलेशनशिप्स ! रिश्तेदारी मत समझना। ये मैं रिश्ते नातों की बात नहीं कर रही। असल में बात तो वही है पर किशोरों और युवाओं द्वारा बनाये गए गैर वैवाहिक प्रेम युक्त रिश्तों के विषय में। उनके लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय तो यही है कि गैर वैवाहिक सम्बन्ध एक स्त्री और पुरुष के मध्य कैसे हो सकता है। ये तो अधर्म है, मूल्यों के खिलाफ है। उससे भी बड़ी चिंता का विषय ये है कि इन्हीं रिलेशनशिप्स के चलते न जाने कितने स्कैंडल्स (धोखाधड़ी) और अपराध आये दिन समाचार पत्रों में सुर्खियाँ बटोरते रहते हैं। चिंता कम , मुझे तो लगता है इस बात की तसल्ली ज्यादा रहती है कि देखो हमारे जीवन मूल्यों से हटकर चलने का परिणाम क्या हुआ ! अब भुगतो !! मैं उनको दोष नहीं दूंगी क्योंकि ये मानवीय प्रवृति है, जब हम एक पहलु को देख रहे होते हैं तो पूर्णतया इस बात को भुला देते हैं कि सिक्के के दूसरी ओर दूसरा पहलु भी एक्सिस्ट करता है। उन्ही रिलेशनशिप्स के चलते कई लोग डिप्रेशन का शिकार होने से बच जाते हैं। इस भीड़ भाड़ भरी दुनिया में कोई दो पल हमारी समस्याएँ गौर से सुनने का समय निकालता है। जब घर-परिवार और दोस्त, सभी से भी सहारा छूटने लगता है तो यही रिलेशनशिप्स हाथ थामने आतें हैं। और उससे भी बड़ी बात एक ऐसी उम्र जिसमें एक व्यक्ति का विचार मात्र भी हमारे मन को गुदगुदा जाता है और थोड़ी सी ख़ुशी दे जाता है , उसमें हानि ही क्या है ? चलो ज्यादा कशीदे नहीं पढ़ूँगी , वरना तुम कहोगी कि तुम भी तो इसके खिलाफ हो ! देखो मैं हूँ तो पर मुझे दूसरा पहलु भी नजर आता है।
अब जनरेशन गैप को उदहारण देके समझाऊँ तो देखो मेरी ही जनरेशन वालों के साथ मेरा जनरेशन गैप चल रहा है। बैकग्राउंड और जगह भी इस गैप को निर्धारित करती हैं। अब गाँव में मेरी ही उम्र की लड़कियों का विवाह हो चुका है २ बच्चें भी हैं। और एक मैं हूँ , अभी खुद ही बच्ची हूँ !! गाँव में लड़कों के साथ लड़कियों का बातचीत करना भी उचित नहीं माना जाता है। और यहाँ मेरा लड़कों के साथ उठना बैठना तक है। मुझे लड़कों से बात करना अपराध नहीं जान पड़ता पर गाँव में रह रही मेरी ही उम्र की लड़की को वो अपराध लगता है। ठीक इसी तरह विवाह से पहले शारीरिक सम्बन्ध होना मुझे अपराध लगता है लेकिन मेरे से बड़े शहर में रह रही लड़की को नहीं लगता। और इससे भी आगे बढ़े तो उस लड़की को विवाह के पहले भी किसी एक के साथ शारीरिक सम्बन्ध होना सही लगता है पर वहीँ उससे भी बड़े शहर में रह रही उस लड़की का शारीरिक सम्बन्ध अपराध लगता है जो कि बहुतों के साथ है। जगह के अनुसार नियमों और मूल्यों में परिवर्तन देख रही हो ? अब इसमें किसको अपराधी ठहराया जाये ? हम चारों एक ही जनरेशन की हमउम्र लड़कियां हैं लेकिन हमारे जीवन मूल्यों में कितनी भिन्नताएँ हैं। गाँव में रह रही लड़की के अनुसार मेरा चरित्र बेकार है क्योंकि मैं लड़कों से बातचीत करती हूँ। मेरे अनुसार उस लड़की का चरित्र ख़राब है जिसके विवाह के पूर्व शारीरिक सम्बन्ध हैं और उस लड़की के अनुसार उसका चरित्र ख़राब है जिसके कईयों के साथ शारीरिक सम्बन्ध रहे हैं। तो अगर देखा जाये तो हममें से कोई भी स्त्री चरित्रवान नहीं है। उस गाँव वाली लड़की का भी गाँव में ही किसी ने चारित्रिक प्रश्नचिन्ह जरूर लगा रखा होगा।
एक और बात बताती हूँ। अपना ही उदहारण लेकर। जैसे मैं घर से जब भी बाहर निकलती हूँ तो बता कर जाती हूँ कि कहाँ जा रही हूँ, किसके साथ जा रही हूँ, और कितने समय के लिए जा रही हूँ। अब चाहे वो किसी महिला मित्र से मिलने जाना हो या पुरुष मित्र से। इसका पहला कारण तो ये है कि एक जानकारी रहे घरवालों को ताकि कोई काम हो तो बता सकें या कोई फ्री की मजदूरी हो तो करा सके कि वहीं हो तो ये-ये सामान लेते आना। और दूसरा सबसे बड़ा कारण ये है कि यहाँ भी वैसे लोग रहते हैं जो ज़माने के साथ आगे नहीं बढ़ पाएं हैं। जिनमें कुछ मेरे जानने वाले भी हैं जिनके लिए लड़कों से बात करना अपराध है। भले वो मित्र के तौर पर मिलें या बॉयफ्रेंड से मिलना तो ख़ैर अक्षम्य अपराध है। मैं अक्सर सोचती थी लड़कियां मुँह पर कपड़ा बांधकर क्यों घूमती हैं अपने प्रेमियों के साथ। अब समझ आ रहा है कि इन्ही रिश्तेदारों की वजह से जो इस ताक में रहते हैं कि कब किसी के घर की बच्ची को किसी लड़के के साथ देखा जाये और कब उसके चरित्र पर कीचड़ उछालकर उसके घरवालों की इज्जत को आड़े हाथ लिया जाये।
एक कंडीशन रखती हूँ तुम्हारे सामने बताना ऐसी परिस्थिति में मुझे क्या करना चाहिए।
मान लो किसी विशेष अवसर पर मैं मंदिर गयी। और संयोगवश मुझे वहाँ मेरी एक सखी मिल गयी वर्षों बाद , वर्ष ज्यादा हो गया ना , हलाकि सच्चाई यही है। यहाँ मैं और मेरी सखी एक ही शहर में इतने पास रहने के बाद भी ३-४ महीनें में एक ही बार मिलते हैं वो भी सिर्फ १-२ घंटे के लिए ! हाँ तो मेरी एक सखी मिल जाती है बहुत समय बाद तो दर्शन के बाद हम दोनों गप्पे मारने रुकेंगे तो जरूर, हाल चाल पूछने , जीवन के अंदर क्या चल रहा है वो जानने के लिए। हो सकता है कि गप्पे मारते मारते भूख भी लग जाये तो पेट पूजा भी करने निकल जाएँ लगे हाथ। लेकिन वहीँ अगर मेरा कोई सखा यानि की पुरुष मित्र मिल जाये तो क्या तब भी मेरा ऐसा करना ठीक होगा ? क्या तब भी मैं उससे गप्पे मारने दर्शन के बाद रुक सकती हूँ ? भूख लगने पर पेट पूजा कर सकती हूँ ? जवाब है नहीं ! क्योंकि मैंने घर पर तो ये बताया हुआ है कि मैं तो मंदिर जा रही हूँ। और दुर्भाग्यवश उसी समय किसी जान पहचान वाले ने देख लिया और घर पर जाकर कानाफूसी कर दी तो !? फिर तो मैं अपने ही घरवालों के सामने झूठी साबित हो जाऊँगी ! हाय ये ओवर थिंकिंग है या कॅल्क्युलेटिव रिस्क !! बड़ी समस्या है ! या तो जब भी बाहर मेरा कोई पुरुष मित्र मिले तो मैं पहले घर पर फ़ोन लगाऊँ कि हेलो मम्मी , या हेल्लो पापा, मैं यहाँ आयी थी और ये मिल गया। इससे रुक कर थोड़ी देर बात कर लूँ या नहीं !! हद्द है भई हद्द है !!
असल में ये समस्या उत्पन्न भी हमारी जनरेशन वालों की वजह से हुयी है। बताया था ना शुरू में वही दूसरी धारा के चलते। जो घर से कहीं और बोलकर निकलती हैं और कहीं और पहुँच जाती हैं। फिर मैं सोचती हूँ बताती क्यों नहीं हैं कि कहाँ जा रही हैं? अरे बॉयफ्रेंड गर्लफ्रेंड से मिलना है तो भी बता कर जाओ घर पर। लेकिन , फिर अचानक ध्यान आता है कि ये तो अपराध है , अब अपराध करने जा रहे हैं ये भी भला कोई बता कर जाता है !! मैं भी ना , पागल ही हूँ एकदम !
चलो जा रही हूँ पढ़ने, आज सुबह सुबह ही तुमसे बात करके अच्छा लगा। ध्यान रखना अपना। जल्दी आने को नहीं कहूँगी क्योंकि इधर व्यस्तता और भी बढ़ने वाली है। फिर भी कोशिश करुँगी आते रहने की। विदा दो।
जिसका मूल्य जितना ज्यादा हो उसे उतनी बड़ी सुरक्षा या निगरानी में रखा जाता है।
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